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Sunday, 22 January 2017

काश ऐसा होता

    
                   काश ऐसा होता                          

वक़्त कैसे पंख लगाकर उड़ जाता हे, पता भी नही चलता।
दारिया की शादी को दस साल गुजर गये। कहने को तो हंसता
खेलता परिवार हे, मगर अंदर एक खालीपन हे जो कभी नही भरता।
इस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश तो बहुत की दारिया ने,खुद को
घर परिवार और बच्चो में व्यस्त कर लिया मगर जब भी थोडा फ्री होती
हे, एक अजीब सी उदासी घेर लेती हे। और वो अपने अतीत में खो जाती
हे, जब वो एक स्कूल गोइंग बच्ची थी।
हमेशा क्लास में अव्वल आनेवाली, अपनी टीचर की फेवरिट। शायद यही
से उसके ख्वाबो की नीव पड़ी थी। क्लास में अव्वल आने पर जब उसकी
टीचर उसको शाबासी देते हुए कहती की ये बच्ची ज़िन्दगी में जरुर कुछ
बनेगी, और उसके लिखे हुए निबन्ध को क्लास में सबके सामने उत्साहवर्धन
के लिए पढकर सुनाती तो उस वक़्त दारिया की आँखों में अलग ही चमक
होती, शायद ख्वाबो की चमक। मगर ज़िन्दगी कई रंग दिखाती हे। हर ख्वाब
को ज़मी मिले ये जरुरी नही।
दारिया के पापा एक औसत दर्जे के संघर्षशील इन्सान थे। अपने चार बच्चो और
बीवी के साथ परिवार के छ:लोगो की जिम्मेदारी उन पर थी। दुनिया और ज़िन्दगी
के मसाइलो से लड़ते लड़ते दारिया के पापा ने खुद पर एक सख्त आवरण चढ़ा लिया
था। शायद डरते हो की ये सख्त आवरण उतार दिया तो दुनिया जीने नही देगी।
मगर ये सख्ती अब आदत में शुमार हो चुकी थी। और घर में भी बात बात पर
छलक जाया करती थी। शायद वो इस बात से बेखबर थे की मासूम बालमन को
सख्ती से ज्यादा मोहब्बत, भरोसे और होसला अफजाई की जरूरत होती हे।
दारिया काबिल लडकी थी मगर उसके ख्वाबो को पंख नही मिल पाए।
कॉलेज पहुचने के पहले दारिया की शादी कर दी गयी। उस दिन पापा के चहरे पर
बड़ा सुकून था, जिम्मेदारी का बोझ जो उतर गया था। शादी के बाद उसने किसी तरह
ग्रेजुएशन तो पूरा किया मगर पति, ससुराल, बच्चा, पदाई और कम उम्र में शादी से
उपजा तनाव के बीच तारतम्य नही बैठा पाई और एक एक करके उसके ख्वाब पीछे
छूटते चले गये। शायद उसने लडकी होने का दंश झेला था। जिन छोटी छोटी बातो के
लिए लडकी को हद दर्जा संघर्ष करना पड़ता हे वो सब लडके को सहज ही उपलब्ध
हो जाते हे। मोहब्बत, होंसला और ये भरोसा की आगे बढो हर हाल में माँ बाप हमारे
साथ हे, और पढ़ लिख कर कुछ कर सकने के लिए वक़्त, बस यही तो चाहा था उसने
नसीब से। क्या कुछ ज्यादा मांग लिया था? सोचते हुए अचानक डोरबेल की आवाज़ से
उसकी तन्द्रा टूटी। स्कूल से लौटकर आयी हुई बेटी को देख अचानक ही दारिया ने उसे
गले लगा लिया और मन ही मन खुद से वादा किया की वो अपनी बेटी को उसके ख्वाबो
की ज़मीन जरुर देगी ताकि वो बढकर आसमान छू सके और उसे कभी अफ़सोस के साथ ये
ना कहना पड़े की “ काश ऐसा होता”।

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