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Monday, 16 January 2017

इंसाफ का कारोबार

लोग शिकवा तो ऐसे करते हे जैसे "उसने" ने ही नसीब लिखा हे,
दर्द लिखा हे, ज़ुल्म लिखा हे, ज़ख्म ओ गम कसीर लिखा हे।

इसीलिए खताकार हे वो, सितमगर हे,ज़ालिम हे, गुनाहगार हे वो,
जज्बों को ना समझने वाला, बेहिस, फरेबी और मक्कार हे वो।

तो ना पाए "वो" सुकूं कभी, लफ्जों के खंज़र दिल के आर पार करो,
इंसाफ का कारोबार करो, उठाओ पत्थर और जम के वार करो।

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