मितभाषी लोगो की भी अपनी मुश्किलें अपनी उलझने हुआ करती हे। बहुत कुछ होता हे कहने को, अंदर ही अंदर बहुत कुछ उमड़ता रहता हे मगर कुछ कहना चाहो तो ऐसा लगता हे की जैसे शब्दों का अकाल पड़ गया हो। ऐसे में लिखना मायने रखता हे। शब्द अंदर रहते हे तो तो भीतर ही भीतर सालते रहते हे, तकलीफ देते रहते हे और मुक्त होते हे तो साहित्य सा कुछ बनता चला जाता हे। या कुछ ना भी बने तब भी एक राहत, चैन सा महसूस होता हे वरना ख़ामोशी या चुप्पी अजीब टीस या चुभन देती रहती हे। और चैन से नही रहने देती।
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