स्त्री, जिनसे जीवन में हर रंग हे। माँ के रूप में खुद को मिटाकर बच्चो की ज़िन्दगी संवारती हुई, बहन के रूप में सुख दुःख बाँटती, बेटी के रूप में घर आंगन में खुशिया बिखेरती और पत्नी,... पत्नी के रूप में तो शायद पुरुषो के लिए पूरी तरह ये समझना भी मुश्किल हे की कोई अंजान व्यक्ति कैसे रिश्तो में बंधकर इतना समर्पित हो सकता हे। बदले में चाहती क्या हे महिलाए...सम्मान और अपने फैसले खुद करने का होंसला। मगर कदम कदम पर उसके होंसले को तोडा जाता हे। हर बढ़ते कदम को रोका जाता हे। क्यू ये तथाकथित सभ्य दुनिया आज भी महिलाओ के लिए सर्वथा असुरक्षित बनी हुई हे? पैदा होते ही उसका संघर्ष शुरू हो जाता हे। उसका जिंदा बचे रहना भी एक उपलब्धि हे। पितृ सत्तात्मक प्रवृत्ति की वजह से लडको को वरीयता दिये जाना मूल्यहीनता हे। जबकि पिछले 100 सालो में स्त्रियों ने आगे बढकर हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लिया हे और इस धारणा को तोड़ दिया हे की स्त्रिया पुरुषो से किसी भी तरह कम हे। इस महिला दिवस पर समाज से सिर्फ एक ही अपील हे की महिलाओ को सिर्फ मौका दे और सुरक्षित माहोल दे, बाकि अपना रास्ता वो खुद तलाश कर लेंगी। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को शुभकामनाए।