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Tuesday, 17 January 2017

या रब, तेरा शुक्रिया

हर इन्सान का रिज्क लिख दिया गया हे। तो हमे उतना ही मिलता हे जितना हमारा रब चाहता हे और बेशक वो हमारा अच्छा बुरा हमसे बेहतर जानता हे। तो जो कम में भी उसका शुक्र अदा करे और खुश रहे तो बस उसके रिज्क में बरकत कर दी जाती हे। बजाहिर कम होते हुए भी पूरा पड़ जाता हे। और जो नाशुक्री करे तो फिर उसके लिए सारा जहा भी कम पड़ता हे। इसी कैफियत को किसी शायर कुछ इस तरह बयाँ किया हे...
"
"ज़िन्दगी जैसी थी तमन्ना, नही कुछ कम हे।
हर घड़ी होता हे अहसास, कही कुछ कम हे।
घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती हे।
अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मी कुछ कम हे।"

और उस रब्बे करीम की करीमी तो देखिये की इस कदर नाशुक्री के बाद भी वो ये नही कहता की जिसे कम लगता हे वो खुदा की सरहदों से बाहर निकल जाये, जबकि ज़मी और आसमा, चाँद तारे, दुनिया और आखिरत, यहा तक की जितने भी जहा हे, सब उसकी सरहदों में हे।
"आखिर हम अपने रब की किन किन नेमतो का इंकार करेंगे"।

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