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Monday, 17 October 2016

दुआ

दुआ पहुची हे तो फिर पूरी जाएगी,
मुश्किल ही सही राह फिर भी निकल ही आएगी।

दौरे बहारा ज़िन्दगी में फिर लौट आएगी,
रात गहरी ही सही मगर सुबह आएगी।

वक़्त बदलने में वक़्त नही लगता,
खुशिया जो मिलेगी तो समेटी ना जाएगी।

हे इम्तिहान सख्त तो रहमत भी बड़ी होगी,
रब..के खजाने में कमी हे ना आएगी।

Sunday, 9 October 2016

दर्द

बुजुर्गो ने संभाल रखा था, जिस विरासत को बरसों,
वो भाईचारे के मोती, क्यूकर बिखर गये।

सियासत की ही ये साजिश दिखाई देती हे वरना,
गीता और कुरान कभी लड़ते, देखे नही गये।

इस शहर की हवाओं में क्या मोहब्बत की कमी हे,
की कोई फेंके जो चिंगारी तो हम बारूद बन गये।

ये पत्थर जो फेंके गये हे, घरो पर हमारे
इंसानियत की रूह को ज़ख़्मी कर गये।

बचपन में जो खेले थे इक गाँव की गलियों में,
नफरत की आग में आखिर क्यूकर झुलस गये।