काश ऐसा होता
वक़्त कैसे पंख लगाकर उड़ जाता हे, पता भी नही चलता।
दारिया की शादी को दस साल गुजर गये। कहने को तो हंसता
खेलता परिवार हे, मगर अंदर एक खालीपन हे जो कभी नही भरता।
इस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश तो बहुत की दारिया ने,खुद को
घर परिवार और बच्चो में व्यस्त कर लिया मगर जब भी थोडा फ्री होती
हे, एक अजीब सी उदासी घेर लेती हे। और वो अपने अतीत में खो जाती
हे, जब वो एक स्कूल गोइंग बच्ची थी।
हमेशा क्लास में अव्वल आनेवाली, अपनी टीचर की फेवरिट। शायद यही
से उसके ख्वाबो की नीव पड़ी थी। क्लास में अव्वल आने पर जब उसकी
टीचर उसको शाबासी देते हुए कहती की ये बच्ची ज़िन्दगी में जरुर कुछ
बनेगी, और उसके लिखे हुए निबन्ध को क्लास में सबके सामने उत्साहवर्धन
के लिए पढकर सुनाती तो उस वक़्त दारिया की आँखों में अलग ही चमक
होती, शायद ख्वाबो की चमक। मगर ज़िन्दगी कई रंग दिखाती हे। हर ख्वाब
को ज़मी मिले ये जरुरी नही।
दारिया के पापा एक औसत दर्जे के संघर्षशील इन्सान थे। अपने चार बच्चो और
बीवी के साथ परिवार के छ:लोगो की जिम्मेदारी उन पर थी। दुनिया और ज़िन्दगी
के मसाइलो से लड़ते लड़ते दारिया के पापा ने खुद पर एक सख्त आवरण चढ़ा लिया
था। शायद डरते हो की ये सख्त आवरण उतार दिया तो दुनिया जीने नही देगी।
मगर ये सख्ती अब आदत में शुमार हो चुकी थी। और घर में भी बात बात पर
छलक जाया करती थी। शायद वो इस बात से बेखबर थे की मासूम बालमन को
सख्ती से ज्यादा मोहब्बत, भरोसे और होसला अफजाई की जरूरत होती हे।
दारिया काबिल लडकी थी मगर उसके ख्वाबो को पंख नही मिल पाए।
कॉलेज पहुचने के पहले दारिया की शादी कर दी गयी। उस दिन पापा के चहरे पर
बड़ा सुकून था, जिम्मेदारी का बोझ जो उतर गया था। शादी के बाद उसने किसी तरह
ग्रेजुएशन तो पूरा किया मगर पति, ससुराल, बच्चा, पदाई और कम उम्र में शादी से
उपजा तनाव के बीच तारतम्य नही बैठा पाई और एक एक करके उसके ख्वाब पीछे
छूटते चले गये। शायद उसने लडकी होने का दंश झेला था। जिन छोटी छोटी बातो के
लिए लडकी को हद दर्जा संघर्ष करना पड़ता हे वो सब लडके को सहज ही उपलब्ध
हो जाते हे। मोहब्बत, होंसला और ये भरोसा की आगे बढो हर हाल में माँ बाप हमारे
साथ हे, और पढ़ लिख कर कुछ कर सकने के लिए वक़्त, बस यही तो चाहा था उसने
नसीब से। क्या कुछ ज्यादा मांग लिया था? सोचते हुए अचानक डोरबेल की आवाज़ से
उसकी तन्द्रा टूटी। स्कूल से लौटकर आयी हुई बेटी को देख अचानक ही दारिया ने उसे
गले लगा लिया और मन ही मन खुद से वादा किया की वो अपनी बेटी को उसके ख्वाबो
की ज़मीन जरुर देगी ताकि वो बढकर आसमान छू सके और उसे कभी अफ़सोस के साथ ये
ना कहना पड़े की “ काश ऐसा होता”।
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Sunday, 22 January 2017
काश ऐसा होता
Thursday, 19 January 2017
कभी जीना ही नही आया
जहा कुछ लोग पत्थर खाकर भी चुप रह जाते हे, वही कुछ लोगो को गुलाब की सुखी पंखुड़िया भी आहत कर जाती हे। शायद नजरिये का फर्क हे वरना किसी को मुस्कुराते देखना क्या इतना मुश्किल हे? दिलो में इतनी नफरते, इतना बोझ रखकर कैसे जी लेते हे लोग। हमे तो कभी ऐसे जीना ही नही आया की...
"मुन्तजिर रहे, कब टूटता हुआ देखे और..
दावा रहा मोहब्बत का तमाम उमर।"
Tuesday, 17 January 2017
या रब, तेरा शुक्रिया
हर इन्सान का रिज्क लिख दिया गया हे। तो हमे उतना ही मिलता हे जितना हमारा रब चाहता हे और बेशक वो हमारा अच्छा बुरा हमसे बेहतर जानता हे। तो जो कम में भी उसका शुक्र अदा करे और खुश रहे तो बस उसके रिज्क में बरकत कर दी जाती हे। बजाहिर कम होते हुए भी पूरा पड़ जाता हे। और जो नाशुक्री करे तो फिर उसके लिए सारा जहा भी कम पड़ता हे। इसी कैफियत को किसी शायर कुछ इस तरह बयाँ किया हे...
"
"ज़िन्दगी जैसी थी तमन्ना, नही कुछ कम हे।
हर घड़ी होता हे अहसास, कही कुछ कम हे।
घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती हे।
अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मी कुछ कम हे।"
और उस रब्बे करीम की करीमी तो देखिये की इस कदर नाशुक्री के बाद भी वो ये नही कहता की जिसे कम लगता हे वो खुदा की सरहदों से बाहर निकल जाये, जबकि ज़मी और आसमा, चाँद तारे, दुनिया और आखिरत, यहा तक की जितने भी जहा हे, सब उसकी सरहदों में हे।
"आखिर हम अपने रब की किन किन नेमतो का इंकार करेंगे"।
डर
" डर"
"अरे बबलू बड़े दिनों बाद आया, कैसा हे रे तू"
"भाभी, मै ठीक हु। यहा से गुजर रहा था तो मिलने आ गया"
"आजकल आता क्यू नही हे"
"भाभी, डर लगता हे, इसलिए ज्यादा नही आता"
"डर ! कैसा डर"
"भाभी मेरी माई मुझे बहुत लाड करती थी। मगर जल्दी ही चली गयी"
"हां, वो तो हे"
"भाभी, तुझे पता हे? मैंने एक तोता पाला था। अपने हाथो से मै उसे खिलाता था। मै जब घर में होता तो उसे आंगन में खोल देता। वो मेरे ही आस पास घूमता रहता। मै उससे खूब बाते किया करता था।....मगर भाभी... कुछ दिन बाद ही उसे बिल्ली ले गयी"
"ओह"
"और तो और भाभी, मै जिस घर काम करने जाता हु, वहा एक दीदी थी। मेरा बहुत ध्यान रखती। मुझे कुछ भी जरूरत होती, में उसी से कहता और वो मुझे हर चीज दिया करती थी। उसने अपना पुराना टीवी भी मुझे दे दिया था। मगर भाभी मेरा नसीब खराब हे। अभी कुछ दिन पहले ही, वो बीमार हुई और ऊपर वाले ने उसे भी उठा लिया। जो भी मुझसे प्रेम रखता हे, उसे...........
तू भी मुझसे इतनी चाहना मत रखा कर भाभी, तुझे कुछ हो गया तो.."
गिरते आंसू और भर्रायी आवाज़ से कही गयी उसकी इस बात का सुधा के पास कोई जवाब नही था। अपनी आँखों की कौर में उभर आये आंसू पोंछते हुए, उसके सिर पर हाथ रखकर बस इतना ही बोल पाई ..
"ऐसा नही हे रे पागल! सब ठीक हो जायेगा।"
और अपनी रसोई की तरफ जाते हुए बस यही सोच रही थी की हम कितनी ही जेहनी तरक्की कर ले, मगर निश्छ्ल प्रेम तो आज भी उन्ही आँखों में बसता हे जिन्हें हम अक्सर कह देते हे "पागल"।
Monday, 16 January 2017
इंसाफ का कारोबार
लोग शिकवा तो ऐसे करते हे जैसे "उसने" ने ही नसीब लिखा हे,
दर्द लिखा हे, ज़ुल्म लिखा हे, ज़ख्म ओ गम कसीर लिखा हे।
इसीलिए खताकार हे वो, सितमगर हे,ज़ालिम हे, गुनाहगार हे वो,
जज्बों को ना समझने वाला, बेहिस, फरेबी और मक्कार हे वो।
तो ना पाए "वो" सुकूं कभी, लफ्जों के खंज़र दिल के आर पार करो,
इंसाफ का कारोबार करो, उठाओ पत्थर और जम के वार करो।
Tuesday, 10 January 2017
वो जो फल बेचकर हौसला खरीदती थी
सिर पर फलो की टोकरी उठाये "वो" हर दिन अम्मी के घर के सामने से गुजरती थी। कितनी ही बार उसे जाते हुए देखा था। 45 के आस पास भी मजबूती के साथ कदम बढ़ाती हुई, जैसे प्रोढ़ता के प्रतिमानो को होंसले से धकेलना चाहती हो। बदरंग सा सलवार कमीज़ और दुपट्टे में लिपटी हुई अधेड उम्र की महिला जो अक्सर फल बेचने जाती हे, बस इतनी सी पहचान थी उससे।
एक दिन पापा से पूछा तो बताया उन्होंने की पति तो कब का गुजर गया, एक बेटा हे वो भी बीमार रहता हे। बीमारी में भी पीना नही छोड़ता और शायद यही वजह थी उसकी बीमारी की भी। उस पर चार बच्चो की जिम्मेदारी। दो नवासे दो नवासी। बेटी को जला कर मार दिया था ससुराल वालो ने। तब से ये चारो बच्चे इसी के साथ हे।
हालाँकि उससे कह दिया था की जब जरूरत हो आ जाया करो, जो भी हो सकेगा कर दिया करेंगे मगर फिर भी पता नही उसकी गैरत थी या शर्म,जब बुलाते तब ही आती चाहे पूरा महिना निकल जाये। और जो हम खुद से उसके हाथ पर रख देते बस चुपचाप लेकर चली जाती।
अभी कुछ दिन पहले ही किसी ने बताया की उसका बेटा भी नही रहा। जैसा भी था कोई मर्द तो था घर में, अब बस चार बच्चे और वो। कुछ दिन वो नजर नही आयी आते जाते। मगर कब तक। फिर एक दिन देखा मैंने उसे उसी तरह टोकरी सिर पर ले जाते हुए। पता नही किसके भरोसे बच्चो को छोडकर निकल पड़ी थी, रोज़ी के लिए, शायद अल्लाह के भरोसे वरना और था भी कौन। उसकी जीवटता, मेहनत और हौसले को देखकर मन सम्मान से भर गया। वरना रमजान में ऐसे ऐसे लोगो को मांगते देखा हे जिनकी झोली भरी होती हे। और अकेले में आपस में कुछ इस तरह की बाते करते हे " पिछली बार तो रमजान में मिले रुपयों से सोने की चेन बनवा ली थी, इस बार थोडा कम हे मगर फिर भी कान की बालिया तो बन ही जाएँगी"।
Sunday, 8 January 2017
कभी चैन से ना रहने दिया तुमने
मितभाषी लोगो की भी अपनी मुश्किलें अपनी उलझने हुआ करती हे। बहुत कुछ होता हे कहने को, अंदर ही अंदर बहुत कुछ उमड़ता रहता हे मगर कुछ कहना चाहो तो ऐसा लगता हे की जैसे शब्दों का अकाल पड़ गया हो। ऐसे में लिखना मायने रखता हे। शब्द अंदर रहते हे तो तो भीतर ही भीतर सालते रहते हे, तकलीफ देते रहते हे और मुक्त होते हे तो साहित्य सा कुछ बनता चला जाता हे। या कुछ ना भी बने तब भी एक राहत, चैन सा महसूस होता हे वरना ख़ामोशी या चुप्पी अजीब टीस या चुभन देती रहती हे। और चैन से नही रहने देती।
इसके सिवा दुनिया में रखा क्या हे
"मम्मा, मुझे ट्रेक सूट चाहिए।"
"पहले तुम ट्रेक पर आ जाओ"
"मम्मा, आप भी ना"
"तो सन्डे हे तो क्या उठना नही हे। चलो नहा धोकर
फ्री हो जाओ"
"थोड़ी देर बाद,प्लीज् मम्मा"
"नो, गेट अप फ़ास्ट"
.
.
.
.
कुछ देर बाद....
"क्यू, अब लग रहा हु ना माँ का लाल"
"हम्म..तुम लाल और तुम्हारे पापा पीले(पीली टी शर्ट में)
..बस अब दोनों मिलकर कोई कारनामे मत करना वरना
मै लाल पीली दोनों हो जाउंगी"
"क्या मम्मा, छुट्टी
के दिन भी मस्ती मज़ा नही करने देती"
" छुट्टी होगी तुम्हारे लिये, मेरे लिए तो एक्स्ट्रा वर्किंग डे होता हे"
और इसी तरह हर सन्डे की तरह ये सन्डे भी गुजर गया, बच्चो पर चिल्लाते, एक्स्ट्रा काम और झुंझलाहट के साथ। मगर फिर भी इन सब के सिवा और दुनिया में रखा क्या हे। बाकि तो सब बस.......
Saturday, 7 January 2017
तुम आ गये हो नूर आ गया हे....
हालाँकि बेटे भी अल्लाह की नेमत होते हे और अल्लाह का शुक्र हे की उसने हमे इस नेमत से भी नवाज़ा मगर बेटी की पैदाइश पर जो ख़ुशी और पूर्णता का अहसास हुआ वो अलग ही था। शायद इसकी वजह ये रही हो की अपने वालिदेंन की एक ही बेटी होने की वजह से बहन की कमी हमेशा खलती रही। कम बोलने की आदत के कारण सहेलिया और दोस्त भी ना के बराबर ही रहे। तो ज़िन्दगी में एक रिक्तता हमेशा बनी रही। अब बेटी को हंसते खिलखिलाते देखती हू तो खालीपन भरता सा महसूस होता हे। ऐसा लगता हे की अपना ही बचपन सामने हे। और इस बार खुद अपने हाथो से अपना बचपन संवार रहे हे। शायद इन सब में उस वक़्त को दोबारा जी लेने की भी छुपी ख्वाहिश हो। खैर जो भी मगर लगता तो यही हे की "तुम आ गये हो, नूर आ गया हे, नही तो चिरागों से लौ जा रही थी"।
Thursday, 5 January 2017
वक़्त मरहम बन जाता हे
क्यू कोई दर्द लिखता हे, दर्द कहता हे,
दर्द सहता हे और दर्द जिए जाता हे।
हे "गुलाब" भी इस जहा में बिखर जाने को,
फिर क्यू काँटों से खुद को छलनी किये जाता हे।
तेरा दर्द "उन आँखों" से छलकता रहे,
तेरे इरादों में कुछ ये भी नजर आता हे।
बारूद को हाथो में दबाये फिरता हे क्यू,
खोल मुट्ठी और वक़्त को बह जाने दे।
ज़ख्म को हरा रखने से क्या गर्ज हे,
लगने दे हवा की वक़्त मरहम बन जाता हे।
Wednesday, 4 January 2017
औपचारिकताए अच्छी हे।
अक्सर लोग ये कहते मिल जाते हे कि हमे फिजूल की औपचारिकताए पसंद नही हे। मगर महिलाओ के मामले में अगर देखा जाये तो, खासकर वो महिलाए जिनका अक्सर बाहर के लोगो से मिलना जुलना होता रहता हे तो, ऐसे मामलो में औपचारिकताए अच्छी हे। क्युकी देखने में तो यही आता हे कि महिलाए जरा सी भी सहज होने लगती हे तो कई पुरुष उनकी इसी सहजता और सरलता को बढ़ावा देना समझ लेते हे। और कभी कभी आगे चलकर ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता हे जो अक्सर जेहनी तकलीफों का सबब बनता हे। ऐसे में यही कहा जा सकता हे की औपचारिकताए अच्छी हे।
Sunday, 1 January 2017
ग़लतफ़हमिया
जहा मंजिले खो जाये उन रास्तो से भटक जाना अच्छा,
हे अगर ज़ख्म तो ज़ख्म का भर जाना अच्छा।
कदम जो मिला ना सके कुछ अपनी बेबसी के सबब,
उन कदमो का पलटकर लौट जाना अच्छा।
सोचा था तुमने जो कुछ गर ना हो वक़्त ऐसा,
गलतफहमियो से बचकर निकल जाना अच्छा।