सिर पर फलो की टोकरी उठाये "वो" हर दिन अम्मी के घर के सामने से गुजरती थी। कितनी ही बार उसे जाते हुए देखा था। 45 के आस पास भी मजबूती के साथ कदम बढ़ाती हुई, जैसे प्रोढ़ता के प्रतिमानो को होंसले से धकेलना चाहती हो। बदरंग सा सलवार कमीज़ और दुपट्टे में लिपटी हुई अधेड उम्र की महिला जो अक्सर फल बेचने जाती हे, बस इतनी सी पहचान थी उससे।
एक दिन पापा से पूछा तो बताया उन्होंने की पति तो कब का गुजर गया, एक बेटा हे वो भी बीमार रहता हे। बीमारी में भी पीना नही छोड़ता और शायद यही वजह थी उसकी बीमारी की भी। उस पर चार बच्चो की जिम्मेदारी। दो नवासे दो नवासी। बेटी को जला कर मार दिया था ससुराल वालो ने। तब से ये चारो बच्चे इसी के साथ हे।
हालाँकि उससे कह दिया था की जब जरूरत हो आ जाया करो, जो भी हो सकेगा कर दिया करेंगे मगर फिर भी पता नही उसकी गैरत थी या शर्म,जब बुलाते तब ही आती चाहे पूरा महिना निकल जाये। और जो हम खुद से उसके हाथ पर रख देते बस चुपचाप लेकर चली जाती।
अभी कुछ दिन पहले ही किसी ने बताया की उसका बेटा भी नही रहा। जैसा भी था कोई मर्द तो था घर में, अब बस चार बच्चे और वो। कुछ दिन वो नजर नही आयी आते जाते। मगर कब तक। फिर एक दिन देखा मैंने उसे उसी तरह टोकरी सिर पर ले जाते हुए। पता नही किसके भरोसे बच्चो को छोडकर निकल पड़ी थी, रोज़ी के लिए, शायद अल्लाह के भरोसे वरना और था भी कौन। उसकी जीवटता, मेहनत और हौसले को देखकर मन सम्मान से भर गया। वरना रमजान में ऐसे ऐसे लोगो को मांगते देखा हे जिनकी झोली भरी होती हे। और अकेले में आपस में कुछ इस तरह की बाते करते हे " पिछली बार तो रमजान में मिले रुपयों से सोने की चेन बनवा ली थी, इस बार थोडा कम हे मगर फिर भी कान की बालिया तो बन ही जाएँगी"।
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Tuesday, 10 January 2017
वो जो फल बेचकर हौसला खरीदती थी
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