हालाँकि बेटे भी अल्लाह की नेमत होते हे और अल्लाह का शुक्र हे की उसने हमे इस नेमत से भी नवाज़ा मगर बेटी की पैदाइश पर जो ख़ुशी और पूर्णता का अहसास हुआ वो अलग ही था। शायद इसकी वजह ये रही हो की अपने वालिदेंन की एक ही बेटी होने की वजह से बहन की कमी हमेशा खलती रही। कम बोलने की आदत के कारण सहेलिया और दोस्त भी ना के बराबर ही रहे। तो ज़िन्दगी में एक रिक्तता हमेशा बनी रही। अब बेटी को हंसते खिलखिलाते देखती हू तो खालीपन भरता सा महसूस होता हे। ऐसा लगता हे की अपना ही बचपन सामने हे। और इस बार खुद अपने हाथो से अपना बचपन संवार रहे हे। शायद इन सब में उस वक़्त को दोबारा जी लेने की भी छुपी ख्वाहिश हो। खैर जो भी मगर लगता तो यही हे की "तुम आ गये हो, नूर आ गया हे, नही तो चिरागों से लौ जा रही थी"।
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