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Tuesday, 17 January 2017

डर

           " डर"

"अरे बबलू बड़े दिनों बाद आया, कैसा हे रे तू"
"भाभी, मै ठीक हु। यहा से गुजर रहा था तो मिलने आ गया"
"आजकल आता क्यू नही हे"
"भाभी, डर लगता हे, इसलिए ज्यादा नही आता"
"डर ! कैसा डर"
"भाभी मेरी माई मुझे बहुत लाड करती थी। मगर जल्दी ही चली गयी"
"हां, वो तो हे"
"भाभी, तुझे पता हे? मैंने एक तोता पाला था। अपने हाथो से मै उसे खिलाता था। मै जब घर में होता तो उसे आंगन में खोल देता। वो मेरे ही आस पास घूमता रहता। मै उससे खूब बाते किया करता था।....मगर भाभी... कुछ दिन बाद ही उसे बिल्ली ले गयी"
"ओह"
"और तो और भाभी, मै जिस घर काम करने जाता हु, वहा एक दीदी थी। मेरा बहुत ध्यान रखती। मुझे कुछ भी जरूरत होती, में उसी से कहता और वो मुझे हर चीज दिया करती थी। उसने अपना पुराना टीवी भी मुझे दे दिया था। मगर भाभी मेरा नसीब खराब हे। अभी कुछ दिन पहले ही, वो बीमार हुई और ऊपर वाले ने उसे भी उठा लिया। जो भी मुझसे प्रेम रखता हे, उसे...........
तू भी मुझसे इतनी चाहना मत रखा कर भाभी, तुझे कुछ हो गया तो.."

गिरते आंसू और भर्रायी आवाज़ से कही गयी उसकी इस बात का सुधा के पास कोई जवाब नही था। अपनी आँखों की कौर में उभर आये आंसू पोंछते हुए, उसके सिर पर हाथ रखकर बस इतना ही बोल पाई ..

"ऐसा नही हे रे पागल! सब ठीक हो जायेगा।"

और अपनी रसोई की तरफ जाते हुए बस यही सोच रही थी की हम कितनी ही जेहनी तरक्की कर ले, मगर निश्छ्ल प्रेम तो आज भी उन्ही आँखों में बसता हे जिन्हें हम अक्सर कह देते हे "पागल"।

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