टूटती उम्मीदे, बिखरते सपने, दरकते शब्दों के बीच से निरपेक्ष गुजर जाने की भी अपनी एक यन्त्रणा(तकलीफ) होती हे। लगता हे कदमो में कांटे बिछे हो और उसकी चुभन आँखों में उतर आयीं हो। मन करता हे की ज़िन्दगी का सफर यही मुकम्मल हो जाये। फिर ना काँटों की चुभन लिए आँखों से टपकता लहू हो और ना ही पीछा करती हुई सिसकती आहे। हो तो बस असीम शांति और सुकून हमेशा के लिए , कयामत तक। ये अलफाज़ क्या खूब बयाँ करते हे....
" ना लफ्जों से लहू निकलता हे, ना किताबे बोल पाती हे,
इक दर्द के दो गवाह, दोनों बेजुबां निकले।"।
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