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Friday, 28 April 2017

ये बेटिया तो बाबुल की शहज़ादिया हे

सुचना प्रसार के इस दौर में, इंसानी अधिकारों के प्रति बढती चेतना और ज्ञान के कारण हमारा परिवेश लगातार बदल रहा हे। हमारे परिवार आज इतने मॉडर्न तो हो ही चुके हे की घरो में बेटे बेटियों के अधिकारों में फर्क नही किया जाता, मगर इतने मॉडर्न भी नही हुए हे की दो, तीन या चार बेटिया अगर किसी के हो जाये तो भी वो खुश होकर शुक्र करे। ऐसे में ना चाहते हुए भी अंदर की झुंझलाहट,  बात बात पर बाहर निकलती रहती हे। मतलब दिल से पूरी तरह बेटा  बेटी के वजूद को बराबरी के साथ क़ुबूल करने के लिए अभी हमारे समाज को शायद कुछ दशको का सफ़र और तय करना पड़े, मगर कुछ लोग अपने वक़्त से आगे होते हे। हमारे नाना ने उस दौर में भी अपनी 6 बेटियों के साथ ख़ुशी और शुक्र के साथ वक़्त गुजारा हे। उनका मानना हे की बेटिया अपना नसीब लेकर आती हे और वो घर और माँ बाप के लिए रहमत होती हे। उस दौर के हिसाब से अच्छी परवरिश के लिए उनसे जो बन पड़ा वो किया। बेटियों को विदा करने के बाद भी वो घर कभी बेटियों के लिए पराया नही रहा। नानी के घर से हमारी भी बचपन की बहुत सी यादे जुडी हे। नानी के घर जाना किसी उत्सव से कम नही हुआ करता था। मौज मस्ती में वो दिन कैसे निकल जाते पता ही नही चलता। नानी के घर में रौनक भी हमेशा ही लगी रहती थी। कोई ना कोई बेटी आती जाती रहती फिर नाती नातियो की रौनक। इनके अलावा मेहमानों के लिए भी घर के सभी लोग हमेशा तैयार। इसलिए मेहमानों का आना जाना भी लगा रहता। उन दिनों नानी के बटुए और नाना की जेब में रूपये भले ही कम रहते हो मगर रसोई घर का भंडार हमेशा भरा रहता। हर आने जाने वाले के लिए नानी का चूल्हा जल जाया करता था। उस दौर मे ओपचारिकताए  कम थी इसलिए जो भी उपलब्ध होता परोस दिया जाता मगर इतना तय था की आने वाला बिना खाना खाए नही जा सकता था।
  हर वार त्यौहार पर बेटियों को कुछ ना कुछ भिजवाते, और जब भी बेटिया मिलने आती उन्हें और नाती नातियो को तोहफे के तौर पर कुछ ना कुछ दिया जाता। अक्सर नये कपड़े हुआ करते। कभी कभी कपड़ो के साथ कुछ और भी। और सबकुछ ख़ुशी ख़ुशी किया जाता।
  आज के दौर में तो लडकिया पढ़ लिख कर अपनी पहचान भी बना रही हे और अपने बल पर कमा कर माँ बाप के बुढ़ापे का सहारा भी बन रही हे। फिर क्यों समाज से कन्या भ्रूण हत्या कम नही हो रही, बल्कि पढ़े लिखे संपन्न तबके के लोग भी शामिल पाए जाते हे। और कुछ ऐसे सफेदपोश डॉक्टर भी जो  ऐसे सम्मानित पेशे से जुडकर भी इस तरह का काम करते हे। शायद उन्हें बच्चियों की जिंदगियो से ज्यादा, अपनी सिडान क्लास फोर व्हीलर और 4 bhk मोड्यूलर, फुल्ली फर्निश्ड बंगले की किश्तों की फ़िक्र होती हे। अक्सर नवजात बच्चियों को फेंके जाने की खबरे भी आती रहती हे। आजकल लोग एक बेटी को तो ख़ुशी ख़ुशी क़ुबूल करते हे मगर एक से ज्यादा बेटियों को  आज भी बोझ समझा जाता हे।
  आज अपने जीवन के 78 बसंत देख चुके नाना के चेहरे पर बिखरा आत्म संतोष का भाव, अपने फर्ज को ख़ुशी ख़ुशी अदा करने के एवज में मिलने वाला सुकून दर्शाता हे। क्या अपनी बच्चियों को कोख में ही मार देने या नवजात को फेंक देने वाले लोग, कभी अपनी जिंदगियो में ऐसा सुकून और करार पा सकते हे??