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Saturday, 25 February 2017

बेजुबां

टूटती उम्मीदे, बिखरते सपने, दरकते शब्दों के बीच से निरपेक्ष गुजर जाने की भी अपनी एक यन्त्रणा(तकलीफ) होती हे। लगता हे कदमो में कांटे बिछे हो और उसकी चुभन आँखों में उतर आयीं हो। मन करता हे की ज़िन्दगी का सफर यही मुकम्मल हो जाये। फिर ना काँटों की चुभन लिए आँखों से टपकता लहू हो और ना ही पीछा करती हुई सिसकती आहे। हो तो बस असीम शांति और सुकून हमेशा के लिए , कयामत तक। ये अलफाज़ क्या खूब बयाँ करते हे....

" ना लफ्जों से लहू निकलता हे, ना किताबे बोल पाती हे,
इक दर्द के दो गवाह, दोनों बेजुबां निकले।"।


Tuesday, 21 February 2017

ये कहा आ गये हम

आज के बच्चो को जब हर वक़्त टीवी, मोबाइल, विडियो गेम में बिजी देखती हू, तो लगता हे की पिछले कुछ सालो में ही दुनिया कितनी बदल गयी हे। हालाँकि पिछली पीढ़ी के मुकाबले इस पीढ़ी के बच्चो को भौतिक सुविधाये अधिक उपलब्ध हे मगर बहुत कुछ ऐसा हे जो इस पीढ़ी के बच्चे मिस कर रहे हे। स्कूल से आते ही पूरा पूरा दिन घर के बाहर दुसरे बच्चो के साथ खेलते रहना। कितनी तरह के खेल हुआ करते थे, सितोलिया, खो खो, कबड्डी, छुपा छुपाई और पता नही कौन कौनसे, नाम भी याद नही रहे अब तो। खेल ही खेल में बच्चे घुल मिलकर रहना, एक दुसरे की मदद करना और सामाजिकता की कई बाते सीख लिया करते थे।
  मोहल्ले में किसी एक की बेटी पुरे मोहल्ले की बेटी समझी जाती थी और किसी एक का बेटा लायक, कामकाजी पुत्तर सभी के लिए। बच्चो का हाल ये था की खेलते खेलते अगर प्यास लगी तो मोहल्ले के किसी भी घर में बेहिचक घुस जाते और आँगन में रखे मटको से पानी पीकर, ये गये वो गये। ट्यूशन व्युशन कोन पड़ता था, स्कूल चले जाते वही बड़ी बात थी। वैसे भी टॉप करने का प्रेशर तो होता नही था। बच्चे एग्जाम में सेकंड डिवीज़न भी पास हो जाते तो भी मोहल्ले भर में मिठाई बंटती थी। आजकल बच्चे फर्स्ट डिवीज़न भी पास हो तब भी चार बाते सुननी पडती हे " 90+  ना हो तो बेकार हे।"
    कुल मिलाकर किताबो और तकनीक में सिर खपाना,  बस यही बचा हे आजकल के बचपन में। और इसके व्यापक विपरीत प्रभाव भी हो रहे हे। शारीरिक गतिविधी कम होने से बच्चो में तेजी से मोटापा बढ़ रहा हे। शोधो से ये भी साबित हुआ हे की हिंसात्मक विडियो गेम का भी बच्चो के कोमल मन पर बुरा प्रभाव होता हे। प्रतिस्पर्धात्मक पढाई के अत्यधिक दबाव की वजह से बच्चो में भी डिप्रेशन का प्रभाव देखा जा रहा हे।
  आखिर ये कहा आ गये हम की बच्चो को बचपन भी मयस्सर ना रहा।

Sunday, 19 February 2017

ये कैसी तस्वीर चमन की

अख़बार में छपनेवाली खबरे समाज में होने वाली घटनाओ का ही तो प्रतिबिम्ब होती हे। अपने बच्चो की रक्षा तो एक जानवर भी कर लेता हे, मगर हजारो वर्षो की निरंतर प्रगति और ज्ञान के फलस्वरूप तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले हमारे समाज में आज भी बच्चियों को पैदा होते ही फेंक देने वाली घटनाए अक्सर सामने आती रहती हे। आज सुबह अख़बार खोलते ही ऐसी ही एक खबर पर नजर पड़ी। खबर देखते ही मन क्षुब्ध हो गया। हालाँकि इस तरह की खबरे अक्सर आती रहती हे मगर चूँकि घटना पास के ही किसी गाँव की थी तो और भी ज्यादा मन खराब हो गया। चाय की मिठास भी जाती रही, ऐसा लगा कडवा घूंट निगल रहे हो। चाय सिंक में फेंककर, मन ठीक करने के लिए टीवी चालू किया। टीवी ऑन करते ही कोई म्यूजिक चैनल लग गया, जिस पर  "माँ  बहन और बीवी" फिल्म का गाना चल रहा था  " नारी कैसी शान हे तेरी, हर तस्वीर महान हे तेरी......."

Tuesday, 14 February 2017

एक शादी ऐसी भी।

कुछ साल पहले कश्मीर में एक शादी अटैंड करने का मौका मिला। परिचित ने काफी अनुरोध से बुलाया था तो जाना तो बनता ही था, फिर कश्मीर की वादियों का भी अपना एक आकर्षण हे। राजस्थान से जम्मू तक का ट्रेन का सफर आसान था। असली सफर तो जम्मू से कश्मीर तक का था, जो की ऐसे रास्तो से होकर गुजरता था की एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ खाई। खैर अल्लाह अल्लाह करके ये सफर भी पूरा किया और नियत समय पर मेजबान को मेजबानी का अवसर दे ही दिया।

वहा के लोगो की खुशमिजाजी और मिलनसारी देखते ही बनती हे। कुछ आराम करके फ्रेश होने के बाद, खाने से फ्री होकर, हमलोग सभी एक हाल में बैठे। जहा घर परिवार और आसपास की औरते मिलकर कुछ संगीत जैसे कार्यक्रम का आयोजन कर रही थी। चूँकि वो सब लोकल कश्मीरी भाषा में गा रही थी तो पल्ले तो कुछ पड़ना था नही मगर उनके सुर बड़े अच्छे थे। बीच बीच में कुछ हिंदी फिल्मो के गाने भी गाए गये। देर रात तक संगीत का कार्यक्रम चला।

दुसरे दिन सुबह से ही बारात की तैयारियों की गहमागहमी शुरू हो गयी। हमने सोचा की चलो फटाफट तैयार हो लेते हे की तभी पता चला की बारात में सिर्फ 50 या 60 लोग जायेंगे। अब इतने से लोगो में हमारा नम्बर कहा आनेवाला था। मगर फिर भी आ गया, परदेसी जो थे।

खैर बारात बिना ताम झाम के सादा तरीके से गयी। हां लडकी वालो ने आवभगत अच्छी की, वैसे भी लडके ने दहेज के लिए मना कर दिया था। बाराती भी इतने कम तो आवभगत तो अच्छी होनी ही थी। और कश्मीर का cuisine तो वैसे भी बहुत समृद्ध हे। खाना भी वहा अलग ही तरीके से परोसा जाता हे। एक बड़ा थाल होता हे। उसमे एक साथ चार लोग खाते हे। थाल में उबले चावल पर तरह तरह की वेज और नॉनवेज रेसिपीज परोसी जाती हे। सभी रेसिपीज का नाम तो याद नही रहा मगर रीस्ता और यखनी गोश्त काफी टेस्टी थे।

एक कमाल की बात और देखी वहा कि खानेवालो को साथ में पोलिथीन दी गयी थी। मेरे साथ आंटी और दीदी थे, उन्होंने बताया की जो ना खा सको उसे इस पोलिथीन में डालना हे ताकि खाना वेस्ट ना हो। हालाँकि मुझे थोडा अजीब लग रहा था और वो मेरी झेप समझ गयी थी, इसलिए जो मैंने नही खाया वो दीदी ने पोलिथीन में डाल दिया। चूँकि वहा का ये चलन था इसलिए वो सहज थी। हालाँकि थोडा अजीब तो था मगर इतने लोगो में भी खाना किसी तरह बर्बाद नही करने का ये अनोखा तरीका निकाल लिया।

एक खास बात और देखी की शादी में लडके वालो की तरफ से दुल्हन को जो ज़ेवर दिए गये वो सब मेहर में दे दिए गये मतलब उसपर लडकी का पूर्णाधिकार हो गया, वरना यहा तो हाल ये हे की शादी के वक़्त तो काफी ज़ेवर दिया जाता हे दिखावे के लिए मगर रिश्ता किसी वजह से टूट जाये तो एक एक अंगूठी तक वापिस ले ली जाती हे।

कुल मिलाकर बड़ी सादा तरीके से बिना दहेज और ज्यादा मेहर के साथ, बिना किसी ताम झाम और दिखावे के, कम बाराती और बिना खाने की बर्बादी के
"एक शादी ऐसी भी"।

Friday, 3 February 2017

बेजुबां

टूटती उम्मीदे, बिखरते सपने, दरकते शब्दों के बीच से निरपेक्ष गुजर जाने की भी अपनी एक यन्त्रणा(तकलीफ) होती हे। लगता हे कदमो में कांटे बिछे हो और उसकी चुभन आँखों में उतर आयीं हो। मन करता हे की ज़िन्दगी का सफर यही मुकम्मल हो जाये। फिर ना काँटों की चुभन लिए आँखों से टपकता लहू हो और ना ही पीछा करती हुई सिसकती आहे। हो तो बस असीम शांति और सुकून हमेशा के लिए , कयामत तक। ये अलफाज़ क्या खूब बयाँ करते हे....

" ना लफ्जों से लहू निकलता हे, ना किताबे बोल पाती हे,
इक दर्द के दो गवाह, दोनों बेजुबां निकले।"।