वैज्ञानिको की कोशिश है, मंगल पर पहुचने की...सोचने की बात ये है कि मंगल पर पहुच भी गये तो होगा क्या...मजा तो तब है जब मंगल को धरती पर ले आये....और ये विज्ञान के जरिये नही..ज्ञान के जरिये संभव होगा..ज्ञान और विज्ञान का भेद मिटाते हुए एक ही बात पूछनी है कि एेसी खोजो मे समय और पैसा नष्ट किये जाने से बेहतर है...कि ऐसी कोशिश की जाये की इस धरती पर मंगल ही मंगल हो...ऐसी वैज्ञानिक खोजो से हमे क्या मतलब, हमे तो उस अलौकिक घटना से मतलब है, जब इंसान..इंसान के करीब आ जाये.........
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Wednesday, 21 October 2015
Monday, 19 October 2015
चैटर बाक्स
महिलाए पुरूषो के मुकाबले ज्यादा सामाजिक होती है..चाहे उनकी सामाजिकता को "चैटर बाक्स" का नाम दे दिया जाये...सहेलियो की आपसी बाते हो या आफिस की बातूनी महिलाए, ये जहा भी होती है बातो के जरिये परस्पर जुडे रहना पसंद करती है...जो ऐसा नही कर पाती कथित "सभ्य आधुनिकता" के नाम पर या किसी भी वजह से, वो कभी ना कभी जिंदगी मे अवसाद का शिकार जरूर होती है...सोशल साइट्स भी अच्छा विकल्प है,मगर अपनी सीमाओ का ख्याल भी जरूरी है...कही ऐसा ना हो कि किसी की गीबत(बुराई) कर बैठे...बेशक अपनी सीमाओ का उल्लंघन,दूसरे की सीमा का अतिकरमण होता है....
Wednesday, 14 October 2015
बचपन
छोटे छोटे बच्चो के मुह से बडो जैसी बाते सुनकर लगता हे की अल्हड..मासूम सा बचपन आज के दौर का सच नही हे। जानकारियों और प्रतियोगिताओ के खारे समंदर में बचपन के झरने की मिठास कही खोकर रह गयी हे। किताबी ज्ञान के ढेर पर बैठी आज की पीढ़ी आंतरिक और व्यावहारिक ज्ञान के मामले में खोखली साबित हो रही हे। एक इंसान की कामयाबी में उसकी स्कूल/कॉलेज की शिक्षा का योगदान सिर्फ 15%होता हे बाकि 85% योगदान उसके नजरिये.. आत्मविश्वास और शख्सियत का होता हे। बड़े होकर करिअर वगेरह की चुनोती मजबूती से झेल सके.. इसकी कोशिश करते करते क्या हमने बच्चो के लिए ये गुंजाईश छोड़ी हे की वो अपनी इस उम्र को भरपूर जी सके जिसे'बचपन' कहते हे। कई बार सुन लेने के बाद भी ये गजल जब कभी कानो में पडती हे तो होंठ खुद ब खुद गुनगुना उठते हे....
"ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी"