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Monday, 16 October 2017

उर्दू .. भाषा से कही बढ़कर

भाषा....यूँ तो अपनी बात कहने का एक जरिया, मगर उर्दू इससे कही बढ़कर इल्म ओ अदब की तहज़ीबी का मयार समझी जाती है। कहते है कि अगर अदब सीखना हो तो उर्दू सीख लो। अब ये अलग बात है कि पहले आप पहले आप मे गाड़ी ही निकल जाये।
  खैर इल्म ओ अदब तो अपनी जगह रहा , मगर हमे लगता है कि उर्दू कुछ कुछ इश्किया भाषा भी है। अब बॉलीवुड के नायकों को ही देख लीजिए। किसी नायक का इश्क पूरा ही नही होता, अगर उर्दू में दो चार डायलॉग या गज़ल, गाने  ना गा ले। और तो और अगर टीन एज बच्चो को अगर उर्दू का शौक लग गया तो माँ बाप की नींद हराम हो जाती है। मने चक्कर क्या है। आजकल बड़ी शायरी कर रहा है। अब शायरी का शौक़ तो यूँ भी हो सकता है बिना किसी चक्कर के।
  और कही पति को उर्दू का शौक लग गया तो  पत्नी तो  "सच का सामना -- द्वितीय" का फार्म ही मंगवा ले, लॉयल्टी टेस्ट के लिए। ☺

वैसे थोड़ी बहुत बोल और पढ़ तो हम भी लेते है उर्दू मगर हमारा तो बस इतना ही है कि --

"बात करने का हसीं तौर तरीका सीखा,
हमने उर्दू के बहाने सलीका सीखा।"

मगर सोचने की बात ये है कि जिनकी मातृभाषा खालिस उर्दू  हो, उनका क्या ☺☺

Thursday, 14 September 2017

हिंदी एक विस्तृत भाषा

हमारे देश मे जिस तरह अंग्रेजी को अपनाया गया है, उस तरह दूसरे देशों में दूसरी भाषा को  नही अपनाया जाता। बाकि देशो में अपनी मातृभाषा को तरजीह दी जाती है। अंग्रेजी को दूसरी भाषा के विकल्प के रूप में कम्युनिकेशन स्किल बढ़ाने के लिए अपनाया जाता है।मग़र हमारे देश मे अंग्रेजी एक भाषा से बढ़कर स्टेटस सिंबल बनती जा रही है जोकि वाकई चिंता का विषय है। लेकिन करीब 77 फीसदी भारतीयों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा हिंदी को किसी भी तरह है हाशिये पर नही रखा जा सकता।

    पिछले कुछ सालों में इस बात की चेतना पैदा भी हो चुकी है औऱ निरंतर बढ़ती जा रही है। आज हर पांच वर्ष में हिंदी की विषय सामग्री में 94% की बढ़ोतरी हो रही है, अंग्रेजी विषय सामग्री के 19% बढ़ोतरी के मुकाबले में। ये सुखद बदलाव है।

   सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा था कि  " हिंदी का पेट महासागर की तरह विस्तृत है, जिसमे सभी भाषाये समा सकती है।"

आज हिंदी विश्व की भाषाओं में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हमें अपनी मातृभाषा हिंदी की रक्षा करते हुए, एक सामान्य भाषा के रूप में अंग्रेजी को ग्रहण करना चाहिए, ना कि स्टेटस सिंबल की तरह।

आज हिंदी दिवस पर सभी हिंदी भाषियों को हार्दिक शुभकामनाएं।

Saturday, 17 June 2017

अनमोल रिश्ता

पिता.. ...जोकि एक ऐसा मुहाफ़िज होता हे जो सारी ज़िन्दगी परिवार की हिफाज़त करता हे, हर तकलीफ, दुःख और मुसीबत से। माँ का महिमामंडन तो बहुत किया गया हे मगर पिता के बारे में कम ही लिखा जाता हे। कभी सख्त तो कभी नरम अंदाज़ में बच्चो को अनुशासन और व्यवहारिकता का पाठ पढ़ाते पापा परिवार की रीढ़ होते हे। बच्चो के लिए शक्ति स्तम्भ। हर परिस्थिति में सबको सम्भालना उनकी पहली जिम्मेदारी हे। परिवार के प्रति जिम्मेदारी और लगाव का भाव तो शुरू से ही रहा हे मगर इस बदलते दौर में पापा और बच्चो के बीच के सम्बन्ध और ज्यादा मजबूत और सहज हुए हे। आज बेटो के साथ साथ आगे बढती हुई बेटियों की उपलब्धिया भी पापा को खूब गौरवान्वित करती हे। ये देखकर ख़ुशी होती हे की आज पिता बेटियों को भी सिर्फ भावनात्मक ही नही बल्कि व्यवहारिक धरातल पर भी आत्मविश्वास के साथ जीना सिखा रहे हे। वाकई ये सुखद बदलाव हे। इस फादर्स डे ऐसे सभी स्नेहिल पिताओ को सलाम।
Happy father's day.

Thursday, 1 June 2017

आखिर कब तक ?

वो भी तो एक मर्द ही हे, महिला सुरक्षा के प्रति इतनी प्रतिबद्धता की सिर्फ 17 साल की उम्र में हैदराबाद के सिद्धार्थ मंडला ने असाधारण इलेक्ट्रोशू बनाया।
इतनी कम उम्र में महिला सुरक्षा के प्रति इतनी संवेदन शीलता, आखिर कहा से मिली प्रेरणा?
  जाहिर सी बात हे किसी भी व्यक्ति का सर्वप्रथम और सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत उसका घर परिवार, माँ बाप होते हे। निर्भया कांड के समय सिद्धार्थ केवल 12 साल का था और उसकी माँ निर्भया कांड के विरोध में सैकड़ो महिलाओ के साथ प्रदर्शन करती थी। जो बच्चे बचपन में अपने घर परिवार और आस पास के परिवेश में महिला का सम्मान होते हुए देखते हे, वो आगे चलकर खुद भी महिलाओ का सम्मान करते हे। मगर हमारे समाज में कितने लोगो को ऐसा परिवेश मिल पाता हे। अक्सरियत तो इस बात की हे की परवरिश में ही लड़का और लड़की में भेद कर दिया जाता हे। मगर बात बस इतनी सी ही नही हे। आज भी सिर्फ बेटियों के बाप की इज्जत बेटो के बाप से कम आंकी जाती हे। बेटियों को जीने की इजाजत मिल भी जाये मगर ख्वाहिश आज भी बेटो की ही की जाती हे, हालाँकि आजकल श्रवण कुमार पैदा नही होते मगर फिर भी। बहन, बेटी, बहू या किसी भी रूप में औरत को फैसला लेने का अधिकार नही होता या कही ये अधिकार मिल भी जाये तो उस पर किसी और की रजामंदी की मुहर अनिवार्य शर्त की तरह हे। बचपन से ही पुरुष मन में महिलाओ से श्रेष्ठता का दंभ पैदा कर दिया जाता हे।
निर्भया कांड हो, तेज़ाब हमले हो, बिजनौर मामला हो या कोई और घटना, ये सभी उस पुरुष मन के श्रेष्ठता के दंभ की निस्कृष्टतम अभिव्यक्ति हे।
प्रेम, करुणा, दया, ममता जैसे मानवीय गुणों की संवाहक स्त्री को ही जब समाज में सम्मान और अधिकार नही दिए जायेंगे तो कैसे हमारी आने वाली पीढ़िया मानवीय गुणों से सुसज्जित होंगी?

Wednesday, 10 May 2017

एक महाभारत मन की रणभूमि पर

एक महाभारत बरसों पहले लड़ी गयी थी,  जिसे दुनिया ने देखा। कौरवो और पांडवो के बीच। मगर एक महाभारत वो भी हे जो किसी को नजर नही आती, मगर लगातार जारी रहती हे। सतत, अनवरत। और उसकी रणभूमि होती हे इन्सान का मन। ये लगातार चलती रहती हे जब से इन्सान समझने और समझाने की उम्र तक पहुच जाता हे। और इस मानसिक अंतर्द्वंद का कमोबेश सभी लोग अनुभव करते हे। हां, इसके कारण और परिणाम  सबके अलग अलग होते हे। सामान्यतया व्यक्ति के लिए इस मानसिक अंतर्द्वंद से बचना बहुत मुश्किल हे और व्यक्ति संवेदनशील हो तो और ज्यादा मुश्किल। मगर हम अगर इतना कर पाये की  इसके कारण भोतिकवादी ना होकर मानवीय संवेदना हो तो शायद परिणामस्वरूप कुछ हद तक सुकून हासिल किया जा सकता हे जोकि सबसे बड़ी दौलत हे। वरना आज के इस दौर में जहा लोग ज्यादा से ज्यादा भौतिकवादी (Materialistic) होते जा रहे हे, वहा आत्मिक सुकून की अनुभूति अपना वजूद खोती जा रही हे। जो लोग इस द्वन्द से पार पा गये वो पा गये मगर आम लोगो के लिए तो यही कहा जा सकता हे की इंसान की स्वयं के साथ एक महाभारत अब भी जारी हे........

Friday, 28 April 2017

ये बेटिया तो बाबुल की शहज़ादिया हे

सुचना प्रसार के इस दौर में, इंसानी अधिकारों के प्रति बढती चेतना और ज्ञान के कारण हमारा परिवेश लगातार बदल रहा हे। हमारे परिवार आज इतने मॉडर्न तो हो ही चुके हे की घरो में बेटे बेटियों के अधिकारों में फर्क नही किया जाता, मगर इतने मॉडर्न भी नही हुए हे की दो, तीन या चार बेटिया अगर किसी के हो जाये तो भी वो खुश होकर शुक्र करे। ऐसे में ना चाहते हुए भी अंदर की झुंझलाहट,  बात बात पर बाहर निकलती रहती हे। मतलब दिल से पूरी तरह बेटा  बेटी के वजूद को बराबरी के साथ क़ुबूल करने के लिए अभी हमारे समाज को शायद कुछ दशको का सफ़र और तय करना पड़े, मगर कुछ लोग अपने वक़्त से आगे होते हे। हमारे नाना ने उस दौर में भी अपनी 6 बेटियों के साथ ख़ुशी और शुक्र के साथ वक़्त गुजारा हे। उनका मानना हे की बेटिया अपना नसीब लेकर आती हे और वो घर और माँ बाप के लिए रहमत होती हे। उस दौर के हिसाब से अच्छी परवरिश के लिए उनसे जो बन पड़ा वो किया। बेटियों को विदा करने के बाद भी वो घर कभी बेटियों के लिए पराया नही रहा। नानी के घर से हमारी भी बचपन की बहुत सी यादे जुडी हे। नानी के घर जाना किसी उत्सव से कम नही हुआ करता था। मौज मस्ती में वो दिन कैसे निकल जाते पता ही नही चलता। नानी के घर में रौनक भी हमेशा ही लगी रहती थी। कोई ना कोई बेटी आती जाती रहती फिर नाती नातियो की रौनक। इनके अलावा मेहमानों के लिए भी घर के सभी लोग हमेशा तैयार। इसलिए मेहमानों का आना जाना भी लगा रहता। उन दिनों नानी के बटुए और नाना की जेब में रूपये भले ही कम रहते हो मगर रसोई घर का भंडार हमेशा भरा रहता। हर आने जाने वाले के लिए नानी का चूल्हा जल जाया करता था। उस दौर मे ओपचारिकताए  कम थी इसलिए जो भी उपलब्ध होता परोस दिया जाता मगर इतना तय था की आने वाला बिना खाना खाए नही जा सकता था।
  हर वार त्यौहार पर बेटियों को कुछ ना कुछ भिजवाते, और जब भी बेटिया मिलने आती उन्हें और नाती नातियो को तोहफे के तौर पर कुछ ना कुछ दिया जाता। अक्सर नये कपड़े हुआ करते। कभी कभी कपड़ो के साथ कुछ और भी। और सबकुछ ख़ुशी ख़ुशी किया जाता।
  आज के दौर में तो लडकिया पढ़ लिख कर अपनी पहचान भी बना रही हे और अपने बल पर कमा कर माँ बाप के बुढ़ापे का सहारा भी बन रही हे। फिर क्यों समाज से कन्या भ्रूण हत्या कम नही हो रही, बल्कि पढ़े लिखे संपन्न तबके के लोग भी शामिल पाए जाते हे। और कुछ ऐसे सफेदपोश डॉक्टर भी जो  ऐसे सम्मानित पेशे से जुडकर भी इस तरह का काम करते हे। शायद उन्हें बच्चियों की जिंदगियो से ज्यादा, अपनी सिडान क्लास फोर व्हीलर और 4 bhk मोड्यूलर, फुल्ली फर्निश्ड बंगले की किश्तों की फ़िक्र होती हे। अक्सर नवजात बच्चियों को फेंके जाने की खबरे भी आती रहती हे। आजकल लोग एक बेटी को तो ख़ुशी ख़ुशी क़ुबूल करते हे मगर एक से ज्यादा बेटियों को  आज भी बोझ समझा जाता हे।
  आज अपने जीवन के 78 बसंत देख चुके नाना के चेहरे पर बिखरा आत्म संतोष का भाव, अपने फर्ज को ख़ुशी ख़ुशी अदा करने के एवज में मिलने वाला सुकून दर्शाता हे। क्या अपनी बच्चियों को कोख में ही मार देने या नवजात को फेंक देने वाले लोग, कभी अपनी जिंदगियो में ऐसा सुकून और करार पा सकते हे??

Wednesday, 8 March 2017

अगर तुम ना होती

स्त्री, जिनसे जीवन में हर रंग हे। माँ के रूप में खुद को मिटाकर बच्चो की ज़िन्दगी  संवारती हुई, बहन के रूप में सुख दुःख बाँटती, बेटी के रूप में घर आंगन में खुशिया बिखेरती और पत्नी,... पत्नी के रूप में तो शायद पुरुषो के लिए पूरी तरह ये समझना भी मुश्किल हे की कोई अंजान व्यक्ति कैसे रिश्तो में बंधकर इतना समर्पित हो सकता हे। बदले में चाहती क्या हे महिलाए...सम्मान और अपने फैसले खुद करने का होंसला। मगर कदम कदम पर उसके होंसले को तोडा जाता हे। हर बढ़ते कदम को रोका जाता हे। क्यू ये तथाकथित सभ्य दुनिया आज भी महिलाओ के लिए सर्वथा असुरक्षित बनी हुई हे?  पैदा होते ही उसका संघर्ष शुरू हो जाता हे। उसका जिंदा बचे रहना भी एक उपलब्धि हे। पितृ सत्तात्मक प्रवृत्ति की वजह से लडको को वरीयता दिये जाना मूल्यहीनता हे। जबकि पिछले 100 सालो में स्त्रियों ने आगे बढकर हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा लिया हे और इस धारणा को तोड़ दिया हे की स्त्रिया पुरुषो से किसी भी तरह कम हे। इस महिला दिवस पर समाज से सिर्फ एक ही अपील हे की महिलाओ को सिर्फ मौका दे और सुरक्षित माहोल दे, बाकि अपना रास्ता वो खुद तलाश कर लेंगी। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सभी को शुभकामनाए।

Saturday, 25 February 2017

बेजुबां

टूटती उम्मीदे, बिखरते सपने, दरकते शब्दों के बीच से निरपेक्ष गुजर जाने की भी अपनी एक यन्त्रणा(तकलीफ) होती हे। लगता हे कदमो में कांटे बिछे हो और उसकी चुभन आँखों में उतर आयीं हो। मन करता हे की ज़िन्दगी का सफर यही मुकम्मल हो जाये। फिर ना काँटों की चुभन लिए आँखों से टपकता लहू हो और ना ही पीछा करती हुई सिसकती आहे। हो तो बस असीम शांति और सुकून हमेशा के लिए , कयामत तक। ये अलफाज़ क्या खूब बयाँ करते हे....

" ना लफ्जों से लहू निकलता हे, ना किताबे बोल पाती हे,
इक दर्द के दो गवाह, दोनों बेजुबां निकले।"।


Tuesday, 21 February 2017

ये कहा आ गये हम

आज के बच्चो को जब हर वक़्त टीवी, मोबाइल, विडियो गेम में बिजी देखती हू, तो लगता हे की पिछले कुछ सालो में ही दुनिया कितनी बदल गयी हे। हालाँकि पिछली पीढ़ी के मुकाबले इस पीढ़ी के बच्चो को भौतिक सुविधाये अधिक उपलब्ध हे मगर बहुत कुछ ऐसा हे जो इस पीढ़ी के बच्चे मिस कर रहे हे। स्कूल से आते ही पूरा पूरा दिन घर के बाहर दुसरे बच्चो के साथ खेलते रहना। कितनी तरह के खेल हुआ करते थे, सितोलिया, खो खो, कबड्डी, छुपा छुपाई और पता नही कौन कौनसे, नाम भी याद नही रहे अब तो। खेल ही खेल में बच्चे घुल मिलकर रहना, एक दुसरे की मदद करना और सामाजिकता की कई बाते सीख लिया करते थे।
  मोहल्ले में किसी एक की बेटी पुरे मोहल्ले की बेटी समझी जाती थी और किसी एक का बेटा लायक, कामकाजी पुत्तर सभी के लिए। बच्चो का हाल ये था की खेलते खेलते अगर प्यास लगी तो मोहल्ले के किसी भी घर में बेहिचक घुस जाते और आँगन में रखे मटको से पानी पीकर, ये गये वो गये। ट्यूशन व्युशन कोन पड़ता था, स्कूल चले जाते वही बड़ी बात थी। वैसे भी टॉप करने का प्रेशर तो होता नही था। बच्चे एग्जाम में सेकंड डिवीज़न भी पास हो जाते तो भी मोहल्ले भर में मिठाई बंटती थी। आजकल बच्चे फर्स्ट डिवीज़न भी पास हो तब भी चार बाते सुननी पडती हे " 90+  ना हो तो बेकार हे।"
    कुल मिलाकर किताबो और तकनीक में सिर खपाना,  बस यही बचा हे आजकल के बचपन में। और इसके व्यापक विपरीत प्रभाव भी हो रहे हे। शारीरिक गतिविधी कम होने से बच्चो में तेजी से मोटापा बढ़ रहा हे। शोधो से ये भी साबित हुआ हे की हिंसात्मक विडियो गेम का भी बच्चो के कोमल मन पर बुरा प्रभाव होता हे। प्रतिस्पर्धात्मक पढाई के अत्यधिक दबाव की वजह से बच्चो में भी डिप्रेशन का प्रभाव देखा जा रहा हे।
  आखिर ये कहा आ गये हम की बच्चो को बचपन भी मयस्सर ना रहा।

Sunday, 19 February 2017

ये कैसी तस्वीर चमन की

अख़बार में छपनेवाली खबरे समाज में होने वाली घटनाओ का ही तो प्रतिबिम्ब होती हे। अपने बच्चो की रक्षा तो एक जानवर भी कर लेता हे, मगर हजारो वर्षो की निरंतर प्रगति और ज्ञान के फलस्वरूप तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले हमारे समाज में आज भी बच्चियों को पैदा होते ही फेंक देने वाली घटनाए अक्सर सामने आती रहती हे। आज सुबह अख़बार खोलते ही ऐसी ही एक खबर पर नजर पड़ी। खबर देखते ही मन क्षुब्ध हो गया। हालाँकि इस तरह की खबरे अक्सर आती रहती हे मगर चूँकि घटना पास के ही किसी गाँव की थी तो और भी ज्यादा मन खराब हो गया। चाय की मिठास भी जाती रही, ऐसा लगा कडवा घूंट निगल रहे हो। चाय सिंक में फेंककर, मन ठीक करने के लिए टीवी चालू किया। टीवी ऑन करते ही कोई म्यूजिक चैनल लग गया, जिस पर  "माँ  बहन और बीवी" फिल्म का गाना चल रहा था  " नारी कैसी शान हे तेरी, हर तस्वीर महान हे तेरी......."

Tuesday, 14 February 2017

एक शादी ऐसी भी।

कुछ साल पहले कश्मीर में एक शादी अटैंड करने का मौका मिला। परिचित ने काफी अनुरोध से बुलाया था तो जाना तो बनता ही था, फिर कश्मीर की वादियों का भी अपना एक आकर्षण हे। राजस्थान से जम्मू तक का ट्रेन का सफर आसान था। असली सफर तो जम्मू से कश्मीर तक का था, जो की ऐसे रास्तो से होकर गुजरता था की एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ खाई। खैर अल्लाह अल्लाह करके ये सफर भी पूरा किया और नियत समय पर मेजबान को मेजबानी का अवसर दे ही दिया।

वहा के लोगो की खुशमिजाजी और मिलनसारी देखते ही बनती हे। कुछ आराम करके फ्रेश होने के बाद, खाने से फ्री होकर, हमलोग सभी एक हाल में बैठे। जहा घर परिवार और आसपास की औरते मिलकर कुछ संगीत जैसे कार्यक्रम का आयोजन कर रही थी। चूँकि वो सब लोकल कश्मीरी भाषा में गा रही थी तो पल्ले तो कुछ पड़ना था नही मगर उनके सुर बड़े अच्छे थे। बीच बीच में कुछ हिंदी फिल्मो के गाने भी गाए गये। देर रात तक संगीत का कार्यक्रम चला।

दुसरे दिन सुबह से ही बारात की तैयारियों की गहमागहमी शुरू हो गयी। हमने सोचा की चलो फटाफट तैयार हो लेते हे की तभी पता चला की बारात में सिर्फ 50 या 60 लोग जायेंगे। अब इतने से लोगो में हमारा नम्बर कहा आनेवाला था। मगर फिर भी आ गया, परदेसी जो थे।

खैर बारात बिना ताम झाम के सादा तरीके से गयी। हां लडकी वालो ने आवभगत अच्छी की, वैसे भी लडके ने दहेज के लिए मना कर दिया था। बाराती भी इतने कम तो आवभगत तो अच्छी होनी ही थी। और कश्मीर का cuisine तो वैसे भी बहुत समृद्ध हे। खाना भी वहा अलग ही तरीके से परोसा जाता हे। एक बड़ा थाल होता हे। उसमे एक साथ चार लोग खाते हे। थाल में उबले चावल पर तरह तरह की वेज और नॉनवेज रेसिपीज परोसी जाती हे। सभी रेसिपीज का नाम तो याद नही रहा मगर रीस्ता और यखनी गोश्त काफी टेस्टी थे।

एक कमाल की बात और देखी वहा कि खानेवालो को साथ में पोलिथीन दी गयी थी। मेरे साथ आंटी और दीदी थे, उन्होंने बताया की जो ना खा सको उसे इस पोलिथीन में डालना हे ताकि खाना वेस्ट ना हो। हालाँकि मुझे थोडा अजीब लग रहा था और वो मेरी झेप समझ गयी थी, इसलिए जो मैंने नही खाया वो दीदी ने पोलिथीन में डाल दिया। चूँकि वहा का ये चलन था इसलिए वो सहज थी। हालाँकि थोडा अजीब तो था मगर इतने लोगो में भी खाना किसी तरह बर्बाद नही करने का ये अनोखा तरीका निकाल लिया।

एक खास बात और देखी की शादी में लडके वालो की तरफ से दुल्हन को जो ज़ेवर दिए गये वो सब मेहर में दे दिए गये मतलब उसपर लडकी का पूर्णाधिकार हो गया, वरना यहा तो हाल ये हे की शादी के वक़्त तो काफी ज़ेवर दिया जाता हे दिखावे के लिए मगर रिश्ता किसी वजह से टूट जाये तो एक एक अंगूठी तक वापिस ले ली जाती हे।

कुल मिलाकर बड़ी सादा तरीके से बिना दहेज और ज्यादा मेहर के साथ, बिना किसी ताम झाम और दिखावे के, कम बाराती और बिना खाने की बर्बादी के
"एक शादी ऐसी भी"।

Friday, 3 February 2017

बेजुबां

टूटती उम्मीदे, बिखरते सपने, दरकते शब्दों के बीच से निरपेक्ष गुजर जाने की भी अपनी एक यन्त्रणा(तकलीफ) होती हे। लगता हे कदमो में कांटे बिछे हो और उसकी चुभन आँखों में उतर आयीं हो। मन करता हे की ज़िन्दगी का सफर यही मुकम्मल हो जाये। फिर ना काँटों की चुभन लिए आँखों से टपकता लहू हो और ना ही पीछा करती हुई सिसकती आहे। हो तो बस असीम शांति और सुकून हमेशा के लिए , कयामत तक। ये अलफाज़ क्या खूब बयाँ करते हे....

" ना लफ्जों से लहू निकलता हे, ना किताबे बोल पाती हे,
इक दर्द के दो गवाह, दोनों बेजुबां निकले।"।

Sunday, 22 January 2017

काश ऐसा होता

    
                   काश ऐसा होता                          

वक़्त कैसे पंख लगाकर उड़ जाता हे, पता भी नही चलता।
दारिया की शादी को दस साल गुजर गये। कहने को तो हंसता
खेलता परिवार हे, मगर अंदर एक खालीपन हे जो कभी नही भरता।
इस रिक्त स्थान को भरने की कोशिश तो बहुत की दारिया ने,खुद को
घर परिवार और बच्चो में व्यस्त कर लिया मगर जब भी थोडा फ्री होती
हे, एक अजीब सी उदासी घेर लेती हे। और वो अपने अतीत में खो जाती
हे, जब वो एक स्कूल गोइंग बच्ची थी।
हमेशा क्लास में अव्वल आनेवाली, अपनी टीचर की फेवरिट। शायद यही
से उसके ख्वाबो की नीव पड़ी थी। क्लास में अव्वल आने पर जब उसकी
टीचर उसको शाबासी देते हुए कहती की ये बच्ची ज़िन्दगी में जरुर कुछ
बनेगी, और उसके लिखे हुए निबन्ध को क्लास में सबके सामने उत्साहवर्धन
के लिए पढकर सुनाती तो उस वक़्त दारिया की आँखों में अलग ही चमक
होती, शायद ख्वाबो की चमक। मगर ज़िन्दगी कई रंग दिखाती हे। हर ख्वाब
को ज़मी मिले ये जरुरी नही।
दारिया के पापा एक औसत दर्जे के संघर्षशील इन्सान थे। अपने चार बच्चो और
बीवी के साथ परिवार के छ:लोगो की जिम्मेदारी उन पर थी। दुनिया और ज़िन्दगी
के मसाइलो से लड़ते लड़ते दारिया के पापा ने खुद पर एक सख्त आवरण चढ़ा लिया
था। शायद डरते हो की ये सख्त आवरण उतार दिया तो दुनिया जीने नही देगी।
मगर ये सख्ती अब आदत में शुमार हो चुकी थी। और घर में भी बात बात पर
छलक जाया करती थी। शायद वो इस बात से बेखबर थे की मासूम बालमन को
सख्ती से ज्यादा मोहब्बत, भरोसे और होसला अफजाई की जरूरत होती हे।
दारिया काबिल लडकी थी मगर उसके ख्वाबो को पंख नही मिल पाए।
कॉलेज पहुचने के पहले दारिया की शादी कर दी गयी। उस दिन पापा के चहरे पर
बड़ा सुकून था, जिम्मेदारी का बोझ जो उतर गया था। शादी के बाद उसने किसी तरह
ग्रेजुएशन तो पूरा किया मगर पति, ससुराल, बच्चा, पदाई और कम उम्र में शादी से
उपजा तनाव के बीच तारतम्य नही बैठा पाई और एक एक करके उसके ख्वाब पीछे
छूटते चले गये। शायद उसने लडकी होने का दंश झेला था। जिन छोटी छोटी बातो के
लिए लडकी को हद दर्जा संघर्ष करना पड़ता हे वो सब लडके को सहज ही उपलब्ध
हो जाते हे। मोहब्बत, होंसला और ये भरोसा की आगे बढो हर हाल में माँ बाप हमारे
साथ हे, और पढ़ लिख कर कुछ कर सकने के लिए वक़्त, बस यही तो चाहा था उसने
नसीब से। क्या कुछ ज्यादा मांग लिया था? सोचते हुए अचानक डोरबेल की आवाज़ से
उसकी तन्द्रा टूटी। स्कूल से लौटकर आयी हुई बेटी को देख अचानक ही दारिया ने उसे
गले लगा लिया और मन ही मन खुद से वादा किया की वो अपनी बेटी को उसके ख्वाबो
की ज़मीन जरुर देगी ताकि वो बढकर आसमान छू सके और उसे कभी अफ़सोस के साथ ये
ना कहना पड़े की “ काश ऐसा होता”।

Thursday, 19 January 2017

कभी जीना ही नही आया

जहा कुछ लोग पत्थर खाकर भी चुप रह जाते हे, वही कुछ लोगो को गुलाब की सुखी पंखुड़िया भी आहत कर जाती हे। शायद नजरिये का फर्क हे वरना किसी को मुस्कुराते देखना क्या इतना मुश्किल हे? दिलो में इतनी नफरते, इतना बोझ रखकर कैसे जी लेते हे लोग। हमे तो कभी ऐसे जीना ही नही आया की...

"मुन्तजिर रहे, कब टूटता हुआ देखे और..
दावा रहा मोहब्बत का तमाम उमर।"

Tuesday, 17 January 2017

या रब, तेरा शुक्रिया

हर इन्सान का रिज्क लिख दिया गया हे। तो हमे उतना ही मिलता हे जितना हमारा रब चाहता हे और बेशक वो हमारा अच्छा बुरा हमसे बेहतर जानता हे। तो जो कम में भी उसका शुक्र अदा करे और खुश रहे तो बस उसके रिज्क में बरकत कर दी जाती हे। बजाहिर कम होते हुए भी पूरा पड़ जाता हे। और जो नाशुक्री करे तो फिर उसके लिए सारा जहा भी कम पड़ता हे। इसी कैफियत को किसी शायर कुछ इस तरह बयाँ किया हे...
"
"ज़िन्दगी जैसी थी तमन्ना, नही कुछ कम हे।
हर घड़ी होता हे अहसास, कही कुछ कम हे।
घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती हे।
अपने नक़्शे के मुताबिक ये ज़मी कुछ कम हे।"

और उस रब्बे करीम की करीमी तो देखिये की इस कदर नाशुक्री के बाद भी वो ये नही कहता की जिसे कम लगता हे वो खुदा की सरहदों से बाहर निकल जाये, जबकि ज़मी और आसमा, चाँद तारे, दुनिया और आखिरत, यहा तक की जितने भी जहा हे, सब उसकी सरहदों में हे।
"आखिर हम अपने रब की किन किन नेमतो का इंकार करेंगे"।