आज के बच्चो को जब हर वक़्त टीवी, मोबाइल, विडियो गेम में बिजी देखती हू, तो लगता हे की पिछले कुछ सालो में ही दुनिया कितनी बदल गयी हे। हालाँकि पिछली पीढ़ी के मुकाबले इस पीढ़ी के बच्चो को भौतिक सुविधाये अधिक उपलब्ध हे मगर बहुत कुछ ऐसा हे जो इस पीढ़ी के बच्चे मिस कर रहे हे। स्कूल से आते ही पूरा पूरा दिन घर के बाहर दुसरे बच्चो के साथ खेलते रहना। कितनी तरह के खेल हुआ करते थे, सितोलिया, खो खो, कबड्डी, छुपा छुपाई और पता नही कौन कौनसे, नाम भी याद नही रहे अब तो। खेल ही खेल में बच्चे घुल मिलकर रहना, एक दुसरे की मदद करना और सामाजिकता की कई बाते सीख लिया करते थे।
मोहल्ले में किसी एक की बेटी पुरे मोहल्ले की बेटी समझी जाती थी और किसी एक का बेटा लायक, कामकाजी पुत्तर सभी के लिए। बच्चो का हाल ये था की खेलते खेलते अगर प्यास लगी तो मोहल्ले के किसी भी घर में बेहिचक घुस जाते और आँगन में रखे मटको से पानी पीकर, ये गये वो गये। ट्यूशन व्युशन कोन पड़ता था, स्कूल चले जाते वही बड़ी बात थी। वैसे भी टॉप करने का प्रेशर तो होता नही था। बच्चे एग्जाम में सेकंड डिवीज़न भी पास हो जाते तो भी मोहल्ले भर में मिठाई बंटती थी। आजकल बच्चे फर्स्ट डिवीज़न भी पास हो तब भी चार बाते सुननी पडती हे " 90+ ना हो तो बेकार हे।"
कुल मिलाकर किताबो और तकनीक में सिर खपाना, बस यही बचा हे आजकल के बचपन में। और इसके व्यापक विपरीत प्रभाव भी हो रहे हे। शारीरिक गतिविधी कम होने से बच्चो में तेजी से मोटापा बढ़ रहा हे। शोधो से ये भी साबित हुआ हे की हिंसात्मक विडियो गेम का भी बच्चो के कोमल मन पर बुरा प्रभाव होता हे। प्रतिस्पर्धात्मक पढाई के अत्यधिक दबाव की वजह से बच्चो में भी डिप्रेशन का प्रभाव देखा जा रहा हे।
आखिर ये कहा आ गये हम की बच्चो को बचपन भी मयस्सर ना रहा।
Search This Blog
Tuesday, 21 February 2017
ये कहा आ गये हम
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment