एक महाभारत बरसों पहले लड़ी गयी थी, जिसे दुनिया ने देखा। कौरवो और पांडवो के बीच। मगर एक महाभारत वो भी हे जो किसी को नजर नही आती, मगर लगातार जारी रहती हे। सतत, अनवरत। और उसकी रणभूमि होती हे इन्सान का मन। ये लगातार चलती रहती हे जब से इन्सान समझने और समझाने की उम्र तक पहुच जाता हे। और इस मानसिक अंतर्द्वंद का कमोबेश सभी लोग अनुभव करते हे। हां, इसके कारण और परिणाम सबके अलग अलग होते हे। सामान्यतया व्यक्ति के लिए इस मानसिक अंतर्द्वंद से बचना बहुत मुश्किल हे और व्यक्ति संवेदनशील हो तो और ज्यादा मुश्किल। मगर हम अगर इतना कर पाये की इसके कारण भोतिकवादी ना होकर मानवीय संवेदना हो तो शायद परिणामस्वरूप कुछ हद तक सुकून हासिल किया जा सकता हे जोकि सबसे बड़ी दौलत हे। वरना आज के इस दौर में जहा लोग ज्यादा से ज्यादा भौतिकवादी (Materialistic) होते जा रहे हे, वहा आत्मिक सुकून की अनुभूति अपना वजूद खोती जा रही हे। जो लोग इस द्वन्द से पार पा गये वो पा गये मगर आम लोगो के लिए तो यही कहा जा सकता हे की इंसान की स्वयं के साथ एक महाभारत अब भी जारी हे........
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