Search This Blog

Tuesday, 14 February 2017

एक शादी ऐसी भी।

कुछ साल पहले कश्मीर में एक शादी अटैंड करने का मौका मिला। परिचित ने काफी अनुरोध से बुलाया था तो जाना तो बनता ही था, फिर कश्मीर की वादियों का भी अपना एक आकर्षण हे। राजस्थान से जम्मू तक का ट्रेन का सफर आसान था। असली सफर तो जम्मू से कश्मीर तक का था, जो की ऐसे रास्तो से होकर गुजरता था की एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ खाई। खैर अल्लाह अल्लाह करके ये सफर भी पूरा किया और नियत समय पर मेजबान को मेजबानी का अवसर दे ही दिया।

वहा के लोगो की खुशमिजाजी और मिलनसारी देखते ही बनती हे। कुछ आराम करके फ्रेश होने के बाद, खाने से फ्री होकर, हमलोग सभी एक हाल में बैठे। जहा घर परिवार और आसपास की औरते मिलकर कुछ संगीत जैसे कार्यक्रम का आयोजन कर रही थी। चूँकि वो सब लोकल कश्मीरी भाषा में गा रही थी तो पल्ले तो कुछ पड़ना था नही मगर उनके सुर बड़े अच्छे थे। बीच बीच में कुछ हिंदी फिल्मो के गाने भी गाए गये। देर रात तक संगीत का कार्यक्रम चला।

दुसरे दिन सुबह से ही बारात की तैयारियों की गहमागहमी शुरू हो गयी। हमने सोचा की चलो फटाफट तैयार हो लेते हे की तभी पता चला की बारात में सिर्फ 50 या 60 लोग जायेंगे। अब इतने से लोगो में हमारा नम्बर कहा आनेवाला था। मगर फिर भी आ गया, परदेसी जो थे।

खैर बारात बिना ताम झाम के सादा तरीके से गयी। हां लडकी वालो ने आवभगत अच्छी की, वैसे भी लडके ने दहेज के लिए मना कर दिया था। बाराती भी इतने कम तो आवभगत तो अच्छी होनी ही थी। और कश्मीर का cuisine तो वैसे भी बहुत समृद्ध हे। खाना भी वहा अलग ही तरीके से परोसा जाता हे। एक बड़ा थाल होता हे। उसमे एक साथ चार लोग खाते हे। थाल में उबले चावल पर तरह तरह की वेज और नॉनवेज रेसिपीज परोसी जाती हे। सभी रेसिपीज का नाम तो याद नही रहा मगर रीस्ता और यखनी गोश्त काफी टेस्टी थे।

एक कमाल की बात और देखी वहा कि खानेवालो को साथ में पोलिथीन दी गयी थी। मेरे साथ आंटी और दीदी थे, उन्होंने बताया की जो ना खा सको उसे इस पोलिथीन में डालना हे ताकि खाना वेस्ट ना हो। हालाँकि मुझे थोडा अजीब लग रहा था और वो मेरी झेप समझ गयी थी, इसलिए जो मैंने नही खाया वो दीदी ने पोलिथीन में डाल दिया। चूँकि वहा का ये चलन था इसलिए वो सहज थी। हालाँकि थोडा अजीब तो था मगर इतने लोगो में भी खाना किसी तरह बर्बाद नही करने का ये अनोखा तरीका निकाल लिया।

एक खास बात और देखी की शादी में लडके वालो की तरफ से दुल्हन को जो ज़ेवर दिए गये वो सब मेहर में दे दिए गये मतलब उसपर लडकी का पूर्णाधिकार हो गया, वरना यहा तो हाल ये हे की शादी के वक़्त तो काफी ज़ेवर दिया जाता हे दिखावे के लिए मगर रिश्ता किसी वजह से टूट जाये तो एक एक अंगूठी तक वापिस ले ली जाती हे।

कुल मिलाकर बड़ी सादा तरीके से बिना दहेज और ज्यादा मेहर के साथ, बिना किसी ताम झाम और दिखावे के, कम बाराती और बिना खाने की बर्बादी के
"एक शादी ऐसी भी"।

No comments:

Post a Comment