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Thursday, 1 June 2017

आखिर कब तक ?

वो भी तो एक मर्द ही हे, महिला सुरक्षा के प्रति इतनी प्रतिबद्धता की सिर्फ 17 साल की उम्र में हैदराबाद के सिद्धार्थ मंडला ने असाधारण इलेक्ट्रोशू बनाया।
इतनी कम उम्र में महिला सुरक्षा के प्रति इतनी संवेदन शीलता, आखिर कहा से मिली प्रेरणा?
  जाहिर सी बात हे किसी भी व्यक्ति का सर्वप्रथम और सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत उसका घर परिवार, माँ बाप होते हे। निर्भया कांड के समय सिद्धार्थ केवल 12 साल का था और उसकी माँ निर्भया कांड के विरोध में सैकड़ो महिलाओ के साथ प्रदर्शन करती थी। जो बच्चे बचपन में अपने घर परिवार और आस पास के परिवेश में महिला का सम्मान होते हुए देखते हे, वो आगे चलकर खुद भी महिलाओ का सम्मान करते हे। मगर हमारे समाज में कितने लोगो को ऐसा परिवेश मिल पाता हे। अक्सरियत तो इस बात की हे की परवरिश में ही लड़का और लड़की में भेद कर दिया जाता हे। मगर बात बस इतनी सी ही नही हे। आज भी सिर्फ बेटियों के बाप की इज्जत बेटो के बाप से कम आंकी जाती हे। बेटियों को जीने की इजाजत मिल भी जाये मगर ख्वाहिश आज भी बेटो की ही की जाती हे, हालाँकि आजकल श्रवण कुमार पैदा नही होते मगर फिर भी। बहन, बेटी, बहू या किसी भी रूप में औरत को फैसला लेने का अधिकार नही होता या कही ये अधिकार मिल भी जाये तो उस पर किसी और की रजामंदी की मुहर अनिवार्य शर्त की तरह हे। बचपन से ही पुरुष मन में महिलाओ से श्रेष्ठता का दंभ पैदा कर दिया जाता हे।
निर्भया कांड हो, तेज़ाब हमले हो, बिजनौर मामला हो या कोई और घटना, ये सभी उस पुरुष मन के श्रेष्ठता के दंभ की निस्कृष्टतम अभिव्यक्ति हे।
प्रेम, करुणा, दया, ममता जैसे मानवीय गुणों की संवाहक स्त्री को ही जब समाज में सम्मान और अधिकार नही दिए जायेंगे तो कैसे हमारी आने वाली पीढ़िया मानवीय गुणों से सुसज्जित होंगी?

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