हम चाहे खुद को कितना भी सभ्य कहे, मगर सच तो यही हे की आज भी हमारे समाज ने औरत को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्वीकार नही किया हे। आज भी किसी स्त्री की ना पुरुष के अहम को चोट देती हे। और पुरुष अपने मर्द होने के अहंकार में चूर, औरत को किसी ना किसी रूप में सबक सिखाने की कोशिश करता हे। ये अलग बात हे की सबका तरीका अलग होता हे। पढ़े लिखे सभ्य और संस्कारी लोग ये काम जरा शालीन तरीके से करते हे। क्या कभी हमारा समाज इतना सभ्य हो पायेगा की किसी औरत की हां या ना उतनी ही मायने रखे जितनी पुरुष की रखती हे।
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