बुजुर्गो ने संभाल रखा था, जिस विरासत को बरसों,
वो भाईचारे के मोती, क्यूकर बिखर गये।
सियासत की ही ये साजिश दिखाई देती हे वरना,
गीता और कुरान कभी लड़ते, देखे नही गये।
इस शहर की हवाओं में क्या मोहब्बत की कमी हे,
की कोई फेंके जो चिंगारी तो हम बारूद बन गये।
ये पत्थर जो फेंके गये हे, घरो पर हमारे
इंसानियत की रूह को ज़ख़्मी कर गये।
बचपन में जो खेले थे इक गाँव की गलियों में,
नफरत की आग में आखिर क्यूकर झुलस गये।
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