हम महिलाये, अपने वजूद को भुलाये हुए.....सुबह की पहली किरन से लेकर रात के दुसरे पहर तक....दरिया की तरह अपनी मौजो को अपने में समेटे हुए......किनारों से बंधी, अविराम बहती हुई.....कभी कभी मन कहता हे की रुको...कभी तो खुद से भी मिलो....खुद को भी कभी महसूस किया करो की कुछ रौनके खुद से भी हुआ करती हे।
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