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Thursday, 1 September 2016

अनकही

स्त्री, जिससे सिर्फ अपेक्षा की जाती हे। क्योकि वो स्त्री हे। एक आदर्श स्त्री की न तो कोई ख्वाहिशे होनी चाहिए न ही कोई अपना फैसला। या यु कहे की उसकी कोई अपनी कोई ज़िन्दगी ही नही। पहले माँ बाप के लिए जीती हे, फिर पति और बच्चो के लिए। चाहती तो वो भी हे, निर्विरोध बहना, किसी विप्लवी नदी की तरह। हर बाधा को पार करते हुए, निरंतर। हर बंधन से मुक्त, जीवन से भरी। चाहती हे अपनी धारा को खुद राह देना, मगर डरती हे, नही तोड़ पाती किनारों के बंधन। ये बंधन उसके अपने ही तो बांधे हुए हे। शायद उसके अस्तित्व के रक्षक। ये किनारे टूट जाये तो शायद इस विप्लवी का अस्तित्व भी ना रहे। काश की कोई ऐसी दुनिया ही जहा बह सके हर किनारे को तोडकर, काश........

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