महिलाए पुरूषो के मुकाबले ज्यादा सामाजिक होती है..चाहे उनकी सामाजिकता को "चैटर बाक्स" का नाम दे दिया जाये...सहेलियो की आपसी बाते हो या आफिस की बातूनी महिलाए, ये जहा भी होती है बातो के जरिये परस्पर जुडे रहना पसंद करती है...जो ऐसा नही कर पाती कथित "सभ्य आधुनिकता" के नाम पर या किसी भी वजह से, वो कभी ना कभी जिंदगी मे अवसाद का शिकार जरूर होती है...सोशल साइट्स भी अच्छा विकल्प है,मगर अपनी सीमाओ का ख्याल भी जरूरी है...कही ऐसा ना हो कि किसी की गीबत(बुराई) कर बैठे...बेशक अपनी सीमाओ का उल्लंघन,दूसरे की सीमा का अतिकरमण होता है....
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