छोटे छोटे बच्चो के मुह से बडो जैसी बाते सुनकर लगता हे की अल्हड..मासूम सा बचपन आज के दौर का सच नही हे। जानकारियों और प्रतियोगिताओ के खारे समंदर में बचपन के झरने की मिठास कही खोकर रह गयी हे। किताबी ज्ञान के ढेर पर बैठी आज की पीढ़ी आंतरिक और व्यावहारिक ज्ञान के मामले में खोखली साबित हो रही हे। एक इंसान की कामयाबी में उसकी स्कूल/कॉलेज की शिक्षा का योगदान सिर्फ 15%होता हे बाकि 85% योगदान उसके नजरिये.. आत्मविश्वास और शख्सियत का होता हे। बड़े होकर करिअर वगेरह की चुनोती मजबूती से झेल सके.. इसकी कोशिश करते करते क्या हमने बच्चो के लिए ये गुंजाईश छोड़ी हे की वो अपनी इस उम्र को भरपूर जी सके जिसे'बचपन' कहते हे। कई बार सुन लेने के बाद भी ये गजल जब कभी कानो में पडती हे तो होंठ खुद ब खुद गुनगुना उठते हे....
"ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी"
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Wednesday, 14 October 2015
बचपन
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